“इस हरे-भरे देश में चारे की कमी नहीं है, -घोटाले

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संजीव कुमार शुक्ला


जो अखबारों में छपते रहते हैं, उनके यहाँ छापा पड़े, यह ठीक नहीं। और छापेमारी तो फ़िर गनीमत है;

कई बार तो देखते-देखते उनको धकियाकर सीधे अंदर कर दिया जाता है। “क्या से क्या हो गए देखते-देखते” गाने की लाइनों का जन्म मूलतः यही से हुआ होगा।

ठीक उसी तरह जिस तरह क्रौंच पक्षी के तीर लगते ही वाल्मीकि जी के मुँह से अचानक भावपंक्तियाँ श्लोक के रूप में अभिव्यक्त हुईं थीं। अरे भाई, जनसेवा करते-करते अगर थोड़ा-बहुत कमाना-खाना हो गया तो इसके मतलब क्या सरकार उनके यहाँ छापा डलवायेगी; उनको जेल भिजवायेगी !!

अरे जेल जायँ उनके दुश्मन …….

समाजवाद को जीने वाले जनसेवकों के यहां छापा!!! 

घोर अनाचार!!! समाजवाद और राष्ट्रवाद को नया आयाम देने वालों के यहाँ छापा…

घोर कलयुग…  

अब आप ही बताइए, अगर किसी ने समाजवाद को ऊपर उठाते-उठाते खुद को थोड़ा सा ऊपर उठा लिया तो कौन-सा गुनाह कर दिया?

आखिर समाजवाद भी तो सबकी उन्नति की बात करता है, ग़रीब तबके के आर्थिक स्तर को उठाने की बात करता है; और फ़िर राजनीति में आने से पहले वह कौन से अमीर थे।

कहने का मतलब समाजवाद सबको आर्थिक रूप से सशक्त बनाने की वकालत करता है, ऐसे में अगर किसी ने शुरुआत खुद को उठाने से कर दी, तो क्या CBI रेड डालेगी? और उसके कृत्य को घोटाले का नाम देकर उसे धकियाकर जेल के अंदर कर देगी।

वह तो कहिये कि हमारे प्रिय जननायक अपनी प्रचंड प्रतिभा के दम पर जेल में भी ससुराल जैसी सुविधाएं हासिल कर लेते हैं; लोग वहाँ भी इनको हाथों-हाथ लेते हैं। पर इसमें घोटाले की जाँच करने वाली एजेंसियों की सहृदयता कहाँ रही??

CBI और अन्य न्यायिक शक्तियाँ तो अपनी कला से नहीं चूकीं। किसी का कैरियर बनते देख इन एजेंसियों के छाती पर साँप लोटने लगता है। वह अपनी तरफ़ से कैरियर चौपट करने में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ रखतीं। एक हिसाब से यह घोर जनविरोधी कार्य है।

जिस जनता ने जिसे अपने अमूल्य वोट से राजनीति के शिखर पर पहुंचाया उसे ये तथाकथित एजेंसियाँ कलंक के गर्त में ढकेलकर उनके कैरियर को चौपट करने की कोशिश करती हैं। आत्मप्रगति को घोटाले का नाम देना स्थिति-परिस्थिति को गलत तरीके से देखना है।

माना कि लोकतंत्र में घोटाले होते रहते हैं, पर यह जरूरी नहीं कि हर घोटाला घोटाले की नीयत से किया गया हो। कुछ घोटाले संभावनाओं की तलाश में किये जाते हैं। अब यह अलग बात है कि बाई प्रोडक्ट के रूप में कुछ कमाने-खाने की संभावना साथ में बन जाये।

उद्देश्य अगर पवित्र है, तो साधनों को लेकर चिल्ल-पों नहीं मचानी चाहिए। ऐसे ही संभावनाओं की तलाश में एक घोटाला किया गया जिसे इतिहास में चारा घोटाले के नाम से जाना जाता है। जैसा कि लोकतंत्र में अक्सर होता है, हर बात का बतंगड बनाना। सो इसका भी बना। 

एक चारा घोटाला क्या हो गया, पूरा मीडिया नेताजी के पीछे पड़ गया; और हम कहते हैं चारा घोटाला ही क्यों, किसी भी प्रकार का घोटाला हो, ये जन्मजात विरोधी पत्रकार और विपक्षी नेता, घोटाले के नाम पर सर पर आसमान उठा लेते हैं। इन्हें दूसरे की बढ़ती देखी नहीं जाती, ये सिर्फ़ घोटाले के नाम पर उस भले आदमी की ऐसी-की-तैसी कर देते हैं;

बिलकुल अमानवीय हद तक आलोचना …. ऐसा नहीं होना चाहिए। यह असंसदीय आचरण है।

हमारे यहां अगर कोई कमी है, तो वह सकारात्मकता की। हम आँखें खोलते ही हैं, सिर्फ़ नकारात्मक चीज़ो को देखने के लिए। बल्कि हम लोग इस प्रवृत्ति को विशिष्टता के तौर पर लेते हैं।

यह दृष्टि गलत है। यह विशुद्ध दृष्टि-दोष है। अरे भई; बात तो तब है कि जब हम बुराई में भी अच्छाईयों को खोज लें। घोटाला तो सबने देखा, लेकिन इस घोटाले के पीछे कितना होमवर्क किया गया, यह किसी ने नहीं देखा और नहीं देखा गया तो इसके पीछे का समर्पण-भाव!!!

घोटाले का आरोप लगाना तो बहुत आसान है, पर निर्विघ्नता से घोटाले करके दिखाना और उसके उच्च मानदण्डों पर खरा उतरना उतना ही कठिन।

इस सतही आरोप ने हमारे घोटालेबाजों की समाजवादी-आत्मा को कितना कष्ट पहुंचाया होगा, यह किसी ने नहीं देखा। घोटाला हुआ है और निश्चित रूप से हुआ है, यह तो सभी मानते हैं और यह तो वह भाईसाब भी मानते हैं जिन्होंने इसे तबीयत से अंजाम दिया है। लेकिन यह कहना कि अमुक माननीय घोटाला करने के लिये ही राजनीति में आये हैं, सरासर गलत है।

आपका तो ऐसा कोई इरादा ही न था, लेकिन न चाहते हुए भी आपने यह सब किया तो सिर्फ इसलिए कि लोग-बाग ये जान सके कि चारा जैसे गौण-क्षेत्र में भी घोटाला किया जा सकता है; बल्कि निर्विघ्न रूप से किया जा सकता है। आपने, अपने को बड़ा इंटेलिजेंट समझने वाले इंटेलिजेंस ब्यूरो को बता दिया कि जहां तुम्हारी बुद्धि काम करना बंद कर देती है, हम वहीं से सोंचना शुरू करते हैं।

कुल मिलाकर यह घोटाला नहीं बल्कि क्रिया-आधारित एक शिक्षण पद्धति है, जिससे सीख लेकर CBI भविष्य में किये जाने वाले घोटालों का आसानी से पर्दाफाश कर सकती है। इस प्रकार हम देखते हैं कि यह हमारे राजनीतिक इतिहास में इकलौता ऐसा घोटाला है जो अपने अंदर लोकहित की भावना पाले हुए है। 

इको-फ्रेंडली होना इस  घोटाले कि अनुपम विशेषता है। अतः इस घटना को श्रध्दाभाव से देखा जाना चाहिए। इसके अलावा इसके  इकलौतेपन की एक और निशानी है, वह यह कि इस घोटाले से कोई आर्थिक नुकसान नहीं हुआ।

इस घटना से क्षुब्ध होकर यदि किसी एक जानवर ने भी आत्महत्या की हो तो बताइए। भई, ऐसा तो है नहीं कि चारा घोटाले के बाद हमारे देश में घास उगनी बंद हो गयी हो। इस हरे-भरे देश में  चारे की कोई कमी नहीं चाहे कोई कितना भी चरे।।। 

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लेखक

संजीव कुमार शुक्ला

 

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