“दंगों के लिए अभिशप्त हम”

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संजीव कुमार शुक्ला

इन दंगो ने देश की शक़्ल बिगाड़ के रख दी है। ये वो ज़ख्म हैं जिनको भरने में सदियां लग जाती हैं। दंगे कहीं के भी हों मरती इंसानियत ही है। वजह मानसिक पिछड़ापन। भले ही आज हम भैतिक सुख-सुविधाओं की दृष्टि से आधुनिक हो गए हों,पर वैचारिक पिछड़ापन अभी भी वर्तमान है।

तकनीकी प्रगति ने भौतिक सुख-सुविधाओं का जिस तरह विस्तार किया है, वह निश्चित रूप से आधुनिकीकरण का ही एक हिस्सा है पर यह समाज की पूरी तश्वीर नहीं है। समाज का एक बड़ा हिस्सा इन सुविधाओं का सजग उपभोक्ता नहीं है। वह सिर्फ़ स्वयं को उपभोग करने तक ही सीमित रखता है।

वह अभी भी 18 वीं सदी में जी रहा है। इसीलिए समाज का एक बड़ा तबका अभी भी पिछड़ा है। दुर्भाग्य से राजनीतिक नेतृत्व के स्तर पर ऐसे कोई गम्भीर प्रयास भी नहीं किये जा रहे जिनसे उम्मीद जगे।

स्वतंत्रता पश्चात लोकतांत्रिक व्यवस्था अपनाए जाने से उम्मीदें जगीं पर कुछ दशकों बाद वोट के सौदागर जनजागरण करने के बजाय जनता को उन्हीं मुद्दों में उलझाए रखना चाहने लगे जो उनका नितांत व्यक्तिगत हित-संवर्धन करने वाले थे।

जाति,भाषा और संप्रदाय की राजनीति का अतीत वह देख चुके थे। इस क्षेत्र में अपनी राजनीति चमकाने की संभावनाओं को लेकर वह आश्वस्त से थे और हैं। सम्प्रदाय की राजनीति को लेकर जिन्ना के प्रयोग को वह देख ही चुके थे,

फिर शक की गुंजाइश कहाँ ??

दुर्भाग्य से ये प्रयोग इतने दशकों बाद आज भी चल रहा और अब तो ख़ैर राजनीति ही प्रयोगों की है। लोग भड़काए जा रहें हैं; भ्रम और भय का वातावरण बनाया जा रहा है। धर्म को रूढ़ बनाने के प्रयास किये जा रहें हैं।

तरल आस्थाएँ रूढ़िवादी मान्यताओं में जकड़ कर हिम शिलाखंड सदृश संवेदनशून्य बनती जा रहीं हैं; ये आस्थाएँ सामुदायिक-अस्मिता की प्रतीक बन रहीं हैं। राजनीति में ध्रुवीकरण के लिहाज से ये ये चीजें ज़्यादा मुफीद हैं, सो इनका धड़ल्ले से उपयोग किया जा रहा है।

धर्म सम्प्रदाय की सीमाओं में जकड़ कर मनुष्य को कट्टरपंथी जमात में तब्दील कर रहा है। यही कट्टरपंथी ताकतें समाज को अस्थिर कर रहीं हैं। आज सत्ता पर सवाल खड़ा करने का मतलब आप देश के साथ गद्दारी कर रहें हैं।

क्या सरकार का विरोध देश का विरोध है??

जी नहीं बिलकुल नहीं। सरकार का विरोध देश का विरोध कतई नहीं है। अगर ऐसा होता तो फ़िर सरकारों के जनविरोधी कार्यों का विरोध करना संभव न होता। अगर ऐसा होता तो फ़िर विरोधी दल का लोकतांत्रिक व्यवस्था में अस्तित्व ही न होता।

यह वैचारिक असहिष्णुता है। आज कट्टरता का जहर दिन-ब-दिन फैलता जा रहा है। और अब तो इसका प्रसारिकरण और भी आसान है। शातिर तरीके से फेक न्यूज़ और हेट स्पीच सोशल मीडिया के जरिये समाज में फैलाई जा रही हैं। ताज्जुब होता है कि इसमें बहुत से पढ़े-लिखे लोग भी शामिल हैं।

अगर आप उनकी वाल पर जाकर देखेगें तो पाएंगे कि वहाँ चीप स्लोगन भरे पड़े हैं जो खास वर्ग को निशाने पर लिए रहते हैं। यह प्रवृत्ति दोनों तरफ़ है। इधर वाले उनको दोषी बता रहे और उधर वाले इनको। सब के सब पूर्व निर्धारित निष्कर्षों के साथ विमर्श में उतरते हैं।

वस्तुतः यह विमर्श है ही नहीं, यहाँ तो अपनी बात मनवाने का दुराग्रह रहता है। सब के सब फारवर्डेड मैसेजेज पर बात करते हैं। सब के सब व्हाट्सएप ज्ञानी हैं। सब के सब सेलेक्टिव अप्रोच वाले दिखते हैं। ये लोग दंगों के परिणामों पर चर्चा नहीं करते उल्टे दंगों में शामिल अपने-अपने गुटों के  कुकृत्यों का औचित्य तलाशते नज़र आते हैं।

हम उस पक्ष को नहीं देखते जो सच है बल्कि हम अपने पक्ष को सच के रूप स्थापित करने के लिये लड़ते घूमते हैं। यहीं वो चीज़े हैं जो सद्भाव पनपने नहीं देतीं। और यहीं वो वजहें हैं जो अविश्वास का वातावरण तैयार करती हैं जिसकी परिणति अन्ततः दंगों में होती है।     

दरअसल हमने लोकतंत्र में सारा काम यहाँ तक कि किसी विषय के औचित्य-अनौचित्य के निर्धारण पर सोचने का भी कार्य नेताओं पर छोड़ दिया है। कुछ सामाजिक दायित्व अपने भी हैं हमने इस विचार पर विचार करने की ज़हमत भी उठानी ठीक न समझी। 

हमने उनको मालिक और खुद को जी हुजूर में बदल लिया है। विवेक गिरवी रख के हमने अनुगामी होने का तमगा हासिल किया है। ऐसे में जो हमारे मालिक कहते हैं, हम वही करते हैं। वह कहते हैं ‘मारो सालों को’ और हम आज्ञा पालन के लिए निकल पड़ते हैं।

बस दंगे शुरू हो जाते हैं। 1946 में ‘प्रत्यक्ष कार्यवाही’ की घोषणा इसी प्रवृत्ति का द्योतक था। स्वतंत्रता के इतने वर्षों बाद भी हम वहीं के वहीं हैं।

हमने सांप्रदायिक अस्मिता को नागरिक होने से ज़्यादा महत्त्व दिया। धार्मिक जुलूसों को निकलने देना या न निकलने देना या फ़िर हम  इधर से ही निकालेंगे आदि-आदि, ये सब शक्ति-प्रदर्शन के व्यवहार हैं जो अपनी प्रभुत्व को स्थापित करने की उद्दाम लालसा से उपजते हैं।

ऐसे में समरसता भंग होती है। इस तरह की नकारात्मक प्रवृत्तियों को सख़्ती से निपटा जा चाहिए। पर यह नियम सबके लिए समानरूप से हो तभी बात बनेगी। क्योंकि तुष्टिकरण बहुत घातक चीज है।

पहले कांग्रेस और अन्य पार्टियों ने मुस्लिम तुष्टिकरण किया तो उसकी प्रतिक्रिया में भाजपा ने हिदुओं के पक्ष का जयगान किया। जबकि भला किसी का नहीं हुआ। आवश्यकता राजधर्म के निर्वहन की है, तुष्टिकरण की नहीं। अगर हम अटल जी के राजधर्म के सिद्धांत को मन से स्वीकार कर लें तो निश्चित रूप से दंगों की विभीषिका से बचा जा सकता है।

गांधी, नेहरू और अटल जी का चेहरा लगा लेने से चीजें नहीं बदलने वाली, अच्छा होगा यदि उनको गहराई से आत्मसात किया जाए। असल दिक्कत यह है कि आज हम अपनी कमियों को नहीं देख पा रहे हैं। अगर कोई सही बात कहने की कोशिश भी करता है तो उसे  मुस्लिम कट्टरपंथियों अथवा हिंदू कट्टरपंथियों की याद दिलाई जाती हैं।

अरे भाई, कभी तो हिन्दू-मुस्लिम से ऊपर उठो! हम तो दोनों तरफ़ के कट्टरपंथी तत्वों पर नकेल कसने को कह रहें हैं। यह क्या बात रही कि अपने कट्टरपंथी तत्वों का बचाव करो और उधर के कट्टरपंथी तत्वों को गोली मारो। अराजक तत्वों को अलग-अलग खेमों में बांट के देखने से बात कभी नहीं बनने वाली। 

सभी के साथ कड़ाई से पेश आया जाय। जो दंगाई होते हैं, वह न तो हिंदू होते हैं, न मुसलमान होते हैं, वह सिर्फ़ दंगाई होते हैं और उनके साथ एक जैसा व्यवहार किया जाना चाहिए।और हाँ, एक बात और; दंगाइयों पर तो रासुका लगे ही, साथ में यह उन नेताओं पर भी लगे जो अपने जहरीले बयानों से समाज को नफ़रत की आग में झोंक देते हैं।

ये नेतागण तो अनर्गल प्रलाप कर अपनी सुरक्षित कोठियों में घुस जाते हैं और मरता है आम आदमी। जब तक इन पर कड़ी कार्यवाही नहीं होगी, दंगे होते रहेंगे। क्योंकि दंगों के असली सूत्रधार यहीं हैं। 

फिर चाहे वह शरजील हो, ताहिर हो, माहिर हो, ओवैसी हो या फ़िर कपिल, साक्षी,अनुराग, गिरिराज या प्रवेश वर्मा हों। सभी के साथ  गैर जिम्मेदाराना बयानबाजी को लेकर सख़्त रवैया अपनाया जाना चाहिए।

दंगों में किसी का घर जले या दुकान पर यह तय है कि नेताओं की दुकान चल निकलती है। उस घर के दर्द को महसूस करके देखिए जिसका चिराग़ अभी-अभी बुझा है

… ...क्या गुजरती है घर के लोगों पर, कभी उनके दुःख का सहभागी बनकर देखिए, फिर पता चलेगा कि दंगों का दर्द क्या होता है

…..अदम गोंडवी का यह शेर और बात ख़त्म-“शहर के दंगो में जब भी मुफ़लिसों के घर जलेकोठियों की लॉन का मंजर सलोना हो गया।”

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लेखक

संजीव कुमार शुक्ला

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