दीवारों की अहमियत

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संजीव कुमार
दीवार शब्द सुनते ही पता नहीं क्यों दिल बैठने सा लगता है; अजीब-अजीब से ख़यालात दिल में आने लगते हैं। लगता है सारी मनहूसियत दीवारों के खड़े होने से ही आती है।

हमें लगता है कि यह बाप-दादाओं से मिली शिक्षा का असर है, जो दीवारों को अब तक अवरोधक के रूप में देखती आई है। जबकि वैज्ञानिक दृष्टि रखने के कारण हमें बख़ूबी पता है कि दीवारें बड़ी काम की होती हैं।

इनके बगैर कहाँ-किसका काम चला है आज तक? अब आप यह मत पूछियेगा कि विज्ञान की डिग्री आपने कहाँ से ली? परसेंटेज क्या रहा, वगैरह-वग़ैरह। तो भाई मेरा आग्रह यह है कि ऐसे नितांत व्यक्तिगत सवाल मुझसे तो क्या किसी से भी नहीं पूछे जाने चाहिए।

ये सवाल नहीं आक्षेप हैं जो हौसला तोड़ देते हैं। भई, विज्ञान विषय और वैज्ञानिक दृष्टि में अंतर है। पढ़ाई मैंने जरूर की है, ये अलग बात है कि हम विज्ञान में कोई “एंटायर डिग्री” नहीं ले पाए।

वैसे कुछ जानकार लोग बताते हैं कि यह विशेष टाइप की “एंटायर डिग्री” सिर्फ़ और सिर्फ़ पोलिटिकल साइंस में ही होती है, जिसे गिने-चुने लोग ही हासिल कर पाते हैं। और रही बात नम्बरों की तो मैंने उसकी चाहत ही कब की ??

“जो मिल गया उसी को मुकद्दर समझ लिया”

वाले मूलमंत्र के साथ खुलकर पढ़ाई की। चूंकि समय का अभाव कभी रहा नहीं, सो कक्षा और उनके उत्तीर्ण-वर्ष  के अंतराल बढ़ते ही रहे। पढ़ाई तो डूबकर के ही की, मगर उत्प्लावन बल ने हमारा साथ न दिया।

मुकद्दर तो जो था, सो था ही, लेकिन हमें लग रहा है कि बात कुछ और भी थी। बिलकुल परवीन शाकिर की नज़्म की तरह। उन्होंने कहीं कहा भी है – “फूलों का बिखरना तो मुकद्दर ही था लेकिन, कुछ इसमें हवाओं की सियासत भी बहुत थी”  

ख़ैर छोड़िए इन सब बातों को। हम तो भटक गए विषय से; ठीक देश के विकास की तरह!! दरअसल आत्मविज्ञापन के लोभ के चलते आदमी अपने मन की बात मौका पाकर कहीं न कहीं जड़ ही देता है। हाँ, तो बात चल रही थी दीवारों की।

ये दीवारें बड़ी काम की होती हैं। अगर दीवारें न हों तो छत किस पर टिकेगी? घर कैसे बनेंगे? इसके अलावा दीवारें न होती तो हम कैसे जान पाते कि “दीवारों के भी कान होते हैं” और हम कैसे जान पाते कि गोपनीयता बनाए रखने के लिए हमें हमेशा खुसुर-फुसुर करके ही बतियाना चाहिए।

अगर दीवारें न होतीं, तो पड़ोसी के घर का आँखों देखा हाल जानने के लिए हम किसके सहारे लटककर के ताका-झांकी करते?? हम भारतीय अपने पड़ोसी को उसके हाल पर नहीं छोड़ सकते।

अगर लोकलाज के चक्कर में हम किसी के फ़टे में अपनी टांग न अड़ा पाए, तो इसका मतलब यह नहीं कि हम तटस्थता-प्रिय लोग हैं। पड़ोस में रहकर, पड़ोस का हाल न जाने, कम-से-कम ऐसी तटस्थता हमें स्वीकार नहीं।   

दीवारें हमारी चेतना का विस्तार है; ये हमारे जिज्ञासु मन को कल्पना के पँख देतीं हैं !!  दीवार न हो, तो दीवार के उस पार क्या हो रहा है, यह जानने की इच्छा ही ख़त्म हो जाए !! दीवार ही है, जो उस पार की जिज्ञासा को जिंदा रक्खे है।

हरिबंश राय बच्चन जी को भी ”उस पार” की चिंता बहुत बेचैन किये रहती थी। वह कहते हैं, “इस पार, प्रिये मधु है तुम हो, उस पार न जाने क्या होगा!”इस तरह दीवारें हमारी सृजनात्मकता के विकास और विस्तार की मुख्य हेतु हैं। मेरे भाई, जब इश्क़ नाकाम हो जाता है, तो यही दीवारें सर पटकने के काम आती हैं।

इसलिए दीवारें बहुत जरूरी हैं। इसके अलावा, होशियार लोग आपस में दीवारें खड़ी करके अपना काम निकाल लेते हैं। यह प्रविधि वैसे तो हर गांव, कस्बे और शहरों में पाई जाती है पर इसका प्रभावी और बहुलता से उपयोग राजनीति के क्षेत्र में होता है। नेतागण इस प्रविधि में विशेष दक्षता रखते हैं।   दीवार के विविध रूप हैं ।

दीवारों का चुनाव, उद्देश्य की प्रकृति के अनुसार किया जाता है। अब जैसे कि ये रहनुमा लोग मजहब की दीवार खड़ी करके नफ़रत की फसल बो लेते हैं, जिसकी कटाई वो अपने हिसाब से मौका देखकर के करते रहते हैं।

चुनावी माहौल में मजहबी दीवारें वोटबैंक के बिखराव को रोकने का काम करती हैं।  निश्चित रूप से दीवारें हमारे जीवन का अभिन्न हिस्सा हैं। पूर्व में दीवारों के बारे में जितना अनाप-शनाप कहा गया है, वह दीवारों को बदनाम करने के लिए कहा गया। हमारे राजनीतिक नेतृत्व ने समाज के इस पारंपरिक मिथ को तोड़ दिया है।

राजनीतिक नेतृत्व के एजेंडे में दीवारों को उठाना और गिराना हमेशा से मुख्य विषय के रूप में रहा। नेतृत्व के द्वारा कई बार दीवारें गिराईं ही इसलिए गईं ताकि नई दीवारें उठाई जा सकें। 

 ज्ञात हो कि दीवारों पर आए तमाम शोधपत्र हमारे राजनीतिक नेतृत्व के मनोमस्तिष्क की ही अभिनव उपज हैं। दीवारों के कृतित्त्व को देखते हुए अब दीवारों के प्रति सहज ही श्रध्दाभाव उमड़ आता है।

हमारे यहाँ नेताओं द्वारा दीवारों पर बहुत काम किया गया है। यहां तक कि, इनके चुनाव प्रचार की शुरूआत ही दीवारों पर क्रांतिधर्मी नारों के लिखने से होती है। दीवारें चुनावी घोषणाओं से पटी रहती हैं।  

इसके अतिरिक्त सरकारी योजनाओं के बारे में आमजन को जानकारी देने के लिए दीवारें लेखपटल के रूप में काम आ रहीं हैं। कहने का मतलब, अब वह दिन दूर नहीं, जब पेपरलेस टेक्नोलॉजी अपने पूरे शबाब के साथ दीवारों पर उतर आएगी।

हालांकि इस खोज के असली हक़दार गली-मोहल्ले के वे लौंडे-लपाड़े हैं, जिन्होंने अपनी लेखकीय प्रतिभा और प्रेम संदेशों का लोकार्पण करने की गरज से दीवारों को अपना कार्यक्षेत्र बनाया। इसके अलावा थूकने और लघुशंका के लिए तो भारतीय दीवारें पहले से ही पूरे विश्व में जानी जाती रहीं हैं।

हमारे यहां दीवारों के रंग-रोगन की समस्या नहीं, क्योंकि हम भारतीय लगभग 5-6 फुट की ऊंचाई तक तो ऐसे ही गुटखा और पान से थूक-थूककर रंग देते हैं। हालांकि फ़िर भी लोग शौकिया तौर पर दीवारें पेंट करवाते हैं।

यह विशुद्ध मनी वेस्टेज है। उनको अगर पेंट करवाना है, तो करवाएँगे ही पर बचत के प्वाइंट ऑफ़ व्यू से, कम से कम उन्हें शुरुआती ऊंचाई के 5-6 फुट थूकने वालों के लिए छोड़ देना चाहिए। इसके साथ ही हमें गर्व है कि हम अपनी दूसरी नितांत वैयक्तिक गतिविधि को भी वैश्विक पहचान दिलाने में कामयाब हुए हैं।

हमारे गाँव में ही पड़ोस में रहने वाले एक भाईसाहब ने अपनी जिंदगी में गली की दीवार की एक जगह-विशेष को कभी सूखने न दिया। उनकी देखा-देखी गली के कुछ कुत्ते भी उस खास जगह को उसी प्रक्रिया के लिए आरक्षित समझ निश्चिंत भाव से दीवार को गीला करते रहे। इस नमी ने दराजों में उग रहे न जाने कितने पौधों को यूँ ही जीवन दे दिया।

इस लोक विधा ने पर्यावरणीय संतुलन को साधने में हमारी कितनी मदद की है, हम बता नहीं सकते। इसके अतिरिक्त टॉयलेट पर खर्च होने वाली एक बड़ी राष्ट्रीय पूंजी को बचा करके हमने प्रकारांतर से अपनी अर्थव्यवस्था को मजबूत किया है। 

इधर दीवारों पर नित नए शोध हो रहें हैं। दीवारों ने हमेशा अपनी उपयोगिता सिद्ध की है। इधर दीवारों के एक अभिनव प्रयोग ने दिल को खुश कर दिया। अभी हाल में एक महत्त्वपूर्ण अतिथि के आगमन पर हमने दीवार का बहुत सकारात्मक उपयोग किया।

अतिथि के ज़ेहन में भारत की अच्छी तश्वीर पेश करने के इरादे से हमने गन्दी झुग्गी-झोपड़ियों को रातों-रात दीवार खड़ी करके ढ़क दिया। इस तरह अब ये दीवारें गरीबी ढ़कने के भी काम आने लगीं; और गरीबी से भी ज़्यादा गरीबों को ढकने के काम!!

क्योंकि गरीबी तो नासमझ होती है, उस बेचारी को क्या कहें, पर ये मुए गरीब तो पैदाइशी हठी होते हैं, जो मौका-बेमौका नहीं देखते और सर उठाए किसी के भी सामने अपनी गरीबी का नुमाया करने चले आते हैं।

अब बताइये, ऐसे में, दीवार न बनाएँ तो क्या करें ??ये दीवारें घर के आंगन में पड़े उस परदे की तरह है, जो बची-खुची बचाये रखती हैं। भई,अपनी इज्ज़त अपने हाथ!!

कोई भी समझदार आदमी अपने घर की इज्ज़त सरेआम नहीं उछाल सकता। और फिर गरीबी कोई दस-पन्द्रह दिन में ख़त्म होने वाली चीज़ तो है नहीं और न ही आप इतनी जल्दी गरीबों का भाग्य बदल सकते हैं।

जो चीजें पिछले 70 सालों में नहीं बदलीं वो यकायक बदल भी कैसे सकती हैं? ऐसे में मेहमान की निगाह से अपनी गरीबी को छुपाने के लिए तात्कालिक विकल्प के रूप में दीवार एक बेहतर विकल्प है।

यही वजह है कि दीवार की उपयोगिता दिनानुदिन बढ़ती ही जा रही है। दीवार का सम्मोहन हमेशा से रहा है।

अपने शुरुआती दौर के आदर्शवादी झोंके में जब मैं दीवार के अखिल भारतीय स्वरूप को समझ न पाया था, दीवार की तौहीन में एक तुकबंदी कर दी थी-

“लोग दीवारें खड़ी करके मकान बना लेते हैं, मेरे दिल के मकां में कोई दीवार नहीं है” आज मैं उसी तुकबंदी को दीवार के सम्मान में खारिज करता हूँ.
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