नमन उन घोटालेबाजों को..

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संजीव कुमार शुक्ला

जिस तरह ईश्वर होता तो है, पर दिखाई नही देता, ठीक उसी तरह घोटाले भी होते तो हैं पर दिखते नहीं।

दिल नमामि घोटाले का करता है।घोटाला चाहे जैसा हो, बड़ा हो या छोटा हो, सब समर्पण की मांग करते हैं, फिर चाहे वह कॉमनवेल्थ गेम्स हो, टूजी-थ्रीजी हो रॉफेल हो या फिर तौल,माप बांट में हेराफेरी वाला, जैसा छोटा घोटाला। इसलिए उसका सम्मान किया ही जाना चाहिए।  

कई लोग घोटाले के नाम से ही चिढ़ जाते हैं और उसे कोर्ट की चौखट तक खींच लाते हैं पर जब कोर्ट साक्ष्य के अभाव में घोटाले को घोटाला मानने से इंकार कर देता हैं तब घोटाला उजागर करने वाले उन अबोधों को अपने जीवन की निस्सारता का बोध होने लगता है। पर इनसे से भी ज़्यादा कष्ट होता है घोटालेबाजों की पत्नियों को।

घोटालेबाजों की पत्नियां अपने-अपने उनसे कहने लगीं की ‘ए राजा’ तुम तो साफ बच गए, पता नहीं तुमसे घोटाला हो भी पाया था या नहीं, हमें तो अब तुम्हारे घोटाले में भी गड़बड़घोटाला लग रहा है;  नहीं तो क्या कोई जांच में इस तरह पाक-साफ निकल के आता है।

अब इन मतिमारियों को कौन समझाए कि आपके ये ‘बहुत बड़े’ वाले हैं। ये कटपीस नहीं बल्कि कपड़ों के पूरे के पूरे थान हैं।ये घोटालेबाज उन्हीं लड़कों के बाप या ताऊ हो सकते हैं जो कुछ वर्षों पूर्व उत्तर प्रदेश के एक शिक्षा सेवा चयन बोर्ड के लिखित परीक्षा में असफल होने के बावजूद साक्षात्कार में  स्थान बनाने में कामयाब हो गए थे, बिलकुल “हम होंगे कामयाब एक दिन” के ठोस मूलमंत्र के साथ।

अब वो तो इन लड़कों का दुर्भाग्य कहिये कि पूरी नदी तैर करके आखिर में किनारे पर आकर के  डूब गये, बिलकुल उसी स्टाइल में जिसमें  कहते हैं न कि ‘मेरी कश्ती वहाँ डूबी जहां पानी कम था’।   

लेकिन इन बच्चों के पकड़े जाने का ये मतलब कतई न निकालें कि इन बच्चों के हुनर में कहीं पर भी कोई कमी थी, ये तो बिचारे उस शाश्वत-सार्वभौमिक ईर्ष्या के शिकार हो गये जो अपने दुख से नहीं बल्कि दूसरों के सुख से पीड़ित है।

कुछ खतरनाक टाइप के हरामी लड़कों ने जो ईमानदारी की राह पर चल रहे थे, लिखित परीक्षा के रिजल्ट वाली लिस्ट मीडिया के सामने पेश कर दी, जिनमें उन लड़कों के नाम दूर-दूर तक नहीं थे।

इन ईमानदार लड़कों की ये दलील थी कि हमने परीक्षा की बड़ी मेहनत से तैयारी की थी अरे भाई तो जिन लड़कों ने मुख्य परीक्षा में असफल होने के बावजूद इंटरव्यू में अपना स्थान सुरक्षित किया, उन्होंने क्या ये सब बगैर मेहनत के किया।   

वैसे ईमानदारी से देखा जाय तो घोटाला ये लोग करते भी नहीं, घोटाले इनसे खुद-ब-खुद स्वभावतः हो जाते हैं। राजनीति के क्षेत्र में घोटाले कुछ ज़्यादा होते हैं, तो उसकी अपनी वजहें हैं। वहाँ घोटाला करने वालों के फेवर में तमाम चीजें रहती हैं; मसलन यहां आपस मे बड़ा सद्भाव रहता है, विशेषकर घोटालों के क्षेत्र में।

बेरोजगारी न होने की वजह से यहां एक-दूसरे को गिराने की कोशिशें नहीं होती, यहां किसी प्रकार की कोई गलाकाट प्रतियोगिता भी नहीं उल्टे पूरी सौमनस्यता के साथ एक-दूसरे से आगे निकलने की होड़ रहती है।

जेल जाकर भी नए कीर्तिमान गढ़ने की तमन्ना इन्हें हमेशा कुछ न कुछ कर गुजरने को प्रेरित करती रहती है। जेल का खाली समय नए घोटालों के सृजन के लिए भावी रणनीति बनाने में बड़ा मददगार साबित होता  है।

जेल से आने के बाद भी सद्भाव उसी तरह से कायम रहता है जैसा पहले कायम था, यहां गांधीजी के तीन बंदरों की भांति ‘हमने कुछ देखा नहीं, हमने कुछ सुना नहीं और हमने कुछ कहा नहीं’ वाले सूत्रवाक्य का अक्षरशः पालन करके एक-दूसरे की मदद की जाती है।

अब ऐसे में अगर जांच एजेंसियों को कोई गवाह, कोई मददगार, कोई क्लू नहीं मिलता तो इसमें इन एजेंसियों का क्या दोष ….और फिर मामले को ढीला बना देने का प्रेशर सो अलग से। इसकेअलावा जांच एजेंसियों के वर्कलोड को भी तो देखिए, एक मामला हो तो देखें भी…..अब वो बिहार, झारखंड,दिल्ली, बम्बई कहाँ-कहाँ दौड़ें और फिर जब नतीजा पहले से मालूम हो तो दौड़ने से फायदा क्या? कुल मिलाकर कहने का मतलब यथार्थ को स्वीकारिये । 

एजेंसियों और कोर्ट की जांच पर सवाल न  खड़ा करके घोटालेबाजों की निष्पापता, निर्लिप्तता को स्वीकारते हुए इनका सम्मान किया जाना चाहिए।।

लेखक

संजीव कुमार शुक्ला

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