“पुरस्कारों का दुत्कारीकरण”

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संजीव शुक्ल

इधर हम भारतीयों में एक सकारात्मक बदलाव आया है, वह है पुरस्कारों का दिल खोलकर देना। अब वो दिन लद गए जब पुरस्कार पाना, ईश्वर को पाने जैसा था। अब ट्रेंड बदल गया है, पुरस्कार कम पड़ जाते हैं, मगर देने का दिल नहीं भरता। यश भारती को ही ले लीजिए, कौन कमबख़्त बचा?? पर दुर्भाग्य से इस उदार ट्रेंड के युग मे भी एक खतरनाक प्रवृत्ति उभर रही है और वह है पुरस्कार लेने से मना कर देना। यह दुःखद है।

ऐसे लोग हर मामले में टांग अड़ाते रहते हैं और कुछ न कुछ कमी निकालते रहते हैं, विशेषकर पुरस्कार ग्रहण करने को लेकर यह दुत्कारीकरण दिनोंदिन बढ़ रहा है।    कुछ लोग स्वभावतः बहुत आड़े-तिरछे होते हैं। “तुम अगर दिन को रात कहो, रात कहेंगे” से ठीक उलट। इनसे अगर आप पूरब की तरफ चलने को कहेंगें तो यक़ीन मानिये साहब पश्चिम को ही जायेंगे।

और ऐसे लोगों को अगर आप सम्मान देने की कोशिश करेंगे तो वह पचास कोने का मुंह बनाकर सम्मान लेने से साफ़ मना कर देंगे। वह डायलॉग मारेंगे कि हम प्रशस्ति-पत्र लेते नहीं, देते हैं …..कहने का मतलब वो आपको आपके व्यक्ति-चुनाव के निर्णय पर गर्व करने का कभी-कोई मौका नहीं देंगे।  यह पूरी की पूरी खेप अहम ब्रम्हास्मि की गर्जनात्मक धारणा में विश्वास करती है। 

पुरस्कार के मामले में ऐसे लोग बहुत ही चूज़ी होते हैं। कुछ लोग पुरस्कार को इतने साफगोई से इंकार करते हैं जैसे उन्हें टाडा में फंसाया गया हो या कि भरी जवानी में उन्हें मार्गदर्शक मंडल के लिये नामित किया गया हो।अभी हाल-फिलहाल में ही पहले पद्मश्री से चयनित एक मोहतरमा ने पद्मश्री लेने से साफ़ इंकार कर दिया। बताते हैं कि आप बहुत ही योग्य लेखिका हैं और सो ख़ैर होंगी भी।

इससे हमें इंकार भी नहीं। कौन हमें इनका इम्तिहान लेना।  बताया जा रहा है कि आप उड़ीसा के मुख्यमंत्री की बहन भी हैं, यह अपने आप में बड़ी वज़नी चीज़ है। हालांकि यह कोई पुरस्कार पाने की निर्धारित योग्यता नहीं है, हाँ अतिरिक्त योग्यता जरूर है। यह ऐसी विशिष्टता है जहाँ  पुरस्कार लेने वाले से ज़्यादा देने वाला कृतार्थ होता है। …….    पर कुछ लोग हटकर होते हैं। ये लोग पुरस्कार का दुत्कारीकरण करके उसकी तौहीन कर देते हैं।

इनकी डेढ़ टाँग अलग ही रहती है। मैम भी इसी बिरादरी की थीं, सो इन्होंने ने भी पुरस्कार लेने से साफ़ मना कर दिया। मैडम पुरस्कार के नाम से बुरा मान गईं। ठीक वैसे ही जैसे पतंजलि वाले बाबा से कोई दुबारा रामलीला मैदान में अन्ना हजारे के साथ अनशन में पार्टिसिपेट करने के लिये कहे…  पर फ़िर भी पुरस्कार ऐसे नहीं मना किया जाता उसके लिए वजह बतानी पड़ती है, जैसे कि संसद में महाभियोग लाने की वजह बतानी पड़ती है। सो उन्होंने भी वज़ह बताई कि लोकसभा चुनाव होने वाले हैं, ऐसे में पुरस्कार लेना ठीक नहीं।

वजह बताने तक तो यह वजह ठीक थी, पर यह कोई वजह जैसी वजह नहीं थी। अब आप ही बताइये कि क्या यह भी कोई वज़ह होती है पुरस्कार को दुत्कारने की ??? आपको नहीं लेना है तो मत लीजिए, पर चुनाव को काहे बदनाम करती हैं। अब पुरस्कार के लिये चुनाव तो नहीं टाले जा सकते। ख़ैर, बात की बात होती है, कह दिया सो कह दिया। पुरस्कार-वितरण से जो थोडा-बहुत चुनावी लाभ मिलने की संभावना बन रही थी वह भी जाती रही। 

लोग पुरस्कार पाने की लिस्ट में अपना नाम डलवाने के लिए क्या-क्या नहीं करते और इन मैडम को मिला है, तो इनको चहिये नहीं। वैसे कुछ लोग इसलिए मना कर देते हैं ताकि लोग उनको जाने ….. उनकी खुद्दारी को पहचाने। .. और फिर वही हुआ जो होता आया है…… पुरस्कार वापसी की घोषणा करने के बाद से ही, ये आदरणीया भी रातोंरात लोगों की निगाह में चढ़ गयीं।

जो मैडम इतना अच्छा लिखने के बावजूद लोगों की नज़रों में न चढ़ सकीं वो पुरस्कृत होने से इंकार करके सुर्खियों में आ गईं। लोग-बाग खोजी पत्रकारिता पर उतर आए। वो जानकारी जुटा रहे थे कि आखिर इन मैडम ने ऐसा क्या कर दिया कि सरकार उनको पद्म पुरस्कार देने पर अड़ गयी। और अगर कर दिया तो अब तक उनकी जानकारी में क्यों नहीं लाया गया? ये लोग बहुत घटिया टाइप के लोग होते हैं जो सरकार की क्षमताओं पर प्रश्नचिन्ह लगाते हैं और उचित-अनुचित का सवाल खड़ा करते हैं!  अरे! वो सरकार ही क्या जो किसी को सम्मानित न कर सके। वह उचित-अनुचित से परे है। भई, उसके लिए क्या असम्भव!!! …”जासु कृपा सो दयाल पंगु चढ़इ गिरिबर गहन”…….
    पर मैडम जी को ये न करना था… अरे माना कि सरकारें, पुरस्कारों को उनके निर्धारित कड़े मानकों को अत्यंत ढीला करके उन्हें सांत्वना पुरस्कार की हद तक ले आईं। मगर आपको उससे क्या ???  यह तो पुरस्कारों का लोकतांत्रिकीकरण है। सबको पुरस्कृत होने का अधिकार है। दूसरे शब्दों में यह सरकार की उदारता है; यह विशुद्ध दिल का मामला है। जिस पर दिल आ गया पुरस्कार देने की घोषणा कर दी। दिल तो दिल है!! 

उसने पुरस्कारों की देहरी पर बैठाए गए कठोर मानकों की कब परवा की है ??? वस्तुतः यह पुरस्कारों की विशिष्टकरण से सामान्यीकरण तक की यात्रा है। यह प्रगति का सूचक है!!! मग़र वही है ना कि जितना करो उतने ही नखरे!! इधर नख़रे दिखाने वालों की फ़ौज लगातार बढ़ती जा रही है। और भी कई लोगों ने सम्मान की बेकदरी की है। यह प्रवृत्ति इधर एक-आध दशक से घातक रूप से फल-फूल रही है।   

ऐसे लोग प्रथमतः तो पुरस्कार लेते नहीं और अगर धोखे से ले भी लिया तो कभी भी वापस कर सकते हैं साथ ही जितने दिन पुरस्कार अपने पास रखा उतने दिन की रखवाई का पैसा भी मांग सकते हैं।  कुछ दिनों पहले देश में फैली  असहिष्णुता के खिलाफ़ थोक भाव में सम्मान वापसी का अभियान चला। इस अभियान के दौरान ही देशवासियों को पहली बार पता चला कि हमारे देश में इतने सम्मानित लोग हैं।

कई भाई लोग तो एक ही सम्मान की चार-चार फोटोकॉपी कराकर और अपने सात-आठ पुरस्कार बताकर पुरस्कार वापसी के उत्सव में अखबार में अपनी फ़ोटो छपा लिए ……… बिल्कुल “अब हम तो सफ़र करते हैं” वाली स्टाइल में !!कुछ लोग तो पुरस्कार लेने के लिए जुगाड़ ही सिर्फ़ इसलिए लगाते हैं ताकि समय आने पर वह इसे ससम्मान वापस कर सकें। ये लोग “एक हाथ सम्मान दो और दूसरे हाथ सम्मान वापस करो” की विचारधारा में विश्वास रखते हैं। इसलिए आपको सम्मान लेना जरूर चाहिए,फिर भले ही आप वापस कर दें। ये सम्मान की लाज है
    अरे सरकार अगर आपको जिंदा रहते सम्मानित कर रही है, वह भी सम्मान से उसका सम्मान छीनकर,  कम-से-कम तब तो आपको उसकी पवित्र भावना का सम्मान करना चाहिए। आज की इस गलाकाट प्रतियोगिता में सम्मान कहाँ सबको नसीब होता है। पहले जब मरणोपरांत पुरस्कार देने का चलन था तब की सोचिये, भाई लोगों के दिल पर क्या गुजरती होगी !!!

उस समय जिंदा रहना पुरस्कार के लिए घोर अपात्रता मानी जाती थी। बहुत से लोग जो  सरकार के अंदर घुसकर अंदर तक देख आये और जब कहीं-कोई पुरस्कार मिलने की सुगबुगाहट नहीं मिली तो मरने में ही बेहतरी समझी पर पुरस्कार नहीं छोड़ा।   

इसलिए सम्मान की बेकद्री ठीक नहीं। और जो लोग ऐसा करने में अपनी शेखी समझते हैं उन्हें समझना चाहिए कि घमंड तो रावण का नहीं चला तो आप किस खेत की मूली हैं!!

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