“सत्ता है अब नगर वधू”

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संजीव कुमार शुक्ला

सत्ता है अब नगर वधू ,  हर  कोई  उसको छूना चाहे ,,

मर्यादा  की  फांद दीवारे , उसको हर कोई  पाना चाहे ,,

दल  बदले , निष्ठाएं  बदलीं ,  टूट गयी सब मर्यादाएँ ,, 

लोकतंत्र  के  अन्तःपुर में , हर कोई अब घुसना  चाहे ,,

सत्ता के   इस चक्रव्यूह में सौ-सौ अभिमन्यू फंसे  हुए ,,

द्यूत समझ जनसेवा को , अब हर  शकुनी  जय  करना चाहे ,,

सत्य -असत्य , अनीति -नीति की व्याख्याएं तब कौन सुनेगा ,, 

जब शासन हो धृतराष्ट्र अंध का गांधारी कितना ही चाहे।

अर्थ सत्य है,सत्य अर्थ है, कर्तव्यों की उठीं अर्थियां

एकाधिकार हो अधिकारों पर जनसेवक कहलाना चाहे।

शान्ति,सुरक्षा सद्भावों के यक्ष सवालों से बच- बचकर ;

सम्बन्धो की चिता जलाकर,मंगल-गीत सुनाना चाहे ।।     

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लेखक

संजीव कुमार शुक्ला

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