साम्प्रदायिकता और हम

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संजीव कुमार शुक्ला

आज जबकि पूरा देश, पूरा विश्व कोरोना महामारी से जूझ रहा है, हमको अपने देश में कोरोना के समानांतर सांप्रदायिक वायरस से भी लड़ना पड़ रहा है। कहने का मतलब हमको एक साथ दो-दो मोर्चों पर लड़ाई लड़नी पड़ रही है।

भले ही कुछ समय लगे कोरोना को तो खत्म होना ही है, क्योंकि हम अपनी इच्छाशक्ति और वैज्ञानिक सोच के दम पर निश्चित ही इसको खत्म करने में सफल होंगे। पर दूसरी महामारी अर्थात सांप्रदायिकता की बीमारी से हम इतनी जल्दी मुक्ति पा लेंगे, संभव नहीं दिखता।

इसका कारण यह है कि अभी हमारे अंदर उस स्तर की इच्छाशक्ति का अभाव है, जो इसके उन्मूलन के लिए अपेक्षित है। हम अभी भी मध्ययुगीन मानसिकता में जी रहें हैं।

यह समस्या कोई आज की नहीं है; हम शताब्दियों से इसके भुक्तभोगी रहें हैं पर विडंबना है कि हमने सांप्रदायिकता के जहर के दुष्परिणामों से कुछ भी सीखा नहीं।  देश की आजादी के समय इसी साम्प्रदायिकता के वायरस ने मानव जाति के एक बड़े हिस्से को संक्रमित कर दिया था। द

ंगों की आग ने न जाने कितने घरों की खुशियों को जलाया। साम्प्रदायिकता दरअसल उस प्रवृत्ति का नाम है जो समुदाय विशेष की अनन्यता पर बल देती है। यह मानती है कि एक समुदाय विशेष के राजनीतिक, आर्थिक व सामाजिक हित एक जैसे होते हैं।

अतः इस दृष्टि से अलग-अलग समुदायों के हित एक जैसे नहीं हो सकते। अलगाववादी मानसिकता यही से अपनी खुराक लेती है। द्विराष्ट्रवाद का सिद्धांत यही से जन्मा।अपने समुदाय की सर्वोच्चता इसका मुख्य उद्देश्य रहता है।

यह समुदाय की आंतरिक विषमताओं यथा जातिभेद, वर्गभेद और लिंगभेद से व्यक्ति का ध्यान हटाकर आस्था के नाम पर उसे संपूर्णता की मिथ्यानुभूति और अपनी धार्मिक अस्मिता पर गर्वित होना सिखाती है।

चुनावी राजनीति के क्षेत्र में इस तरह के लामबंद समूह मजबूत वोटबैंक बन जाते हैं, लिहाजा राजनीतिक दलों द्वारा साम्प्रदायिक राजनीति को खूब प्रोत्साहित किया जाता है। स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान अंग्रेजों ने अपनी सत्ता को अक्षुण्ण रखने के लिए भारतीय एकता को खंडित करने के उद्देश्य से साम्प्रदायिकता को ढाल के रूप में इस्तेमाल किया। 

साम्प्रदायिक राजनीति ने मानवीय मूल्यों का तो क्षरण किया ही है, साथ ही इसने राष्ट्रीय एकता को भी हर बार क्षति पहुंचाई है। आधुनिकता के दौर में इस तरह की घटनाएं सभ्य समाज को शर्मसार करने वाली हैं।   

इधर तबलीगी जमात के मौलाना ने जिस तरह हठधर्मिता दिखाई, उससे पूरे समाज को शर्मसार होना पड़ा है। कोरोना महामारी के संदर्भ में मौलाना साद द्वारा जिस तरह यह कहा गया कि यह हमारा कुछ नहीं बिगाड़ सकती, यह सब हम लोगों को मिलने-जुलने से रोकने की सिर्फ साजिश है, उससे पता चलता है कि यह कठमुल्लापन न केवल मानवीय मूल्यों से परे घोर आत्मकेंद्रित विचारधारा है, अपितु यह मनुष्यों में भेड़चाल की प्रवृत्ति विकसित करने का विशिष्ट उद्योग भी है।

ये लोग हाथ मे एंड्रॉयड फोन होने के बावजूद दिलोदिमाग से मध्ययुगीन सभ्यता को जीने की हसरत रखते हैं। यहाँ यह ध्यान दिया जाय कि इस कठमुल्लापन पर सिर्फ़ मुसलमानों का ही एकाधिकार नहीं है, हिंदुओं में भी कठमुल्लापन बढ़ रहा है। भेड़चाल की प्रवृत्ति इधर हिंदुओं में भी खूब फल-फूल रही है।

वहाँ भी भेड़ो की एक नई जमात तैयार की जा रही है, जो अपने धार्मिक,सामाजिक व राजनीतिक नेतृत्व पर सवाल न खड़ा करे। जाहिलियत दोनों तरफ है। नई तरह की जमातों की नई भीड़ बढ़ रही है जिनमें कट्टरता के अतिरिक्त और कुछ नहीं सिखाया जाता हैं। स्वतंत्र सोच का यहां कोई स्थान नहीं। एक के हुआ-हुआ करने पर शेष लोग भी वही करने लगते हैं। यह सभ्य समाज के लिए बहुत ही त्रासद स्थिति है।    

धर्म सभी अच्छे हैं; सभी में अच्छी बातें हैं, पर जब हम दूसरे के मत को तिरस्कृत करते हुए मात्र अपने पक्ष को ही सत्य की एकमात्र व्याख्या मान, उसका महिमामंडन करने लगते हैं तब हम अमानवीय हो जाते हैं। कट्टरता यहीं से शुरू होती है। 

तबलीगी मरकज के मौलाना का व्यवहार निश्चित रूप से घोर निंदनीय है। उन्होंने देश और मानवतावादी मूल्यों से ज़्यादा अपने खास सम्प्रदाय को महत्त्व दिया। यद्यपि  इस मामले में शासन-प्रशासन की भूमिका भी निर्दोष नहीं है, उसने भी अपने दायित्व कहाँ निभाए? अगर सरकार के निर्देशों को तबलीगी जमात के मुखिया ने मानने से इंकार किया तो उस पर समय रहते एक्शन क्यों नहीं लिया गया ?? नाकामी तो आपकी भी है सरकार!       

संकीर्ण साम्प्रदायिक विचारों को रोका जा सकता है पर तब जब हम सेलेक्टिव अप्रोच छोड़कर एक साथ इनके खिलाफ खड़े हों जाएं। ये सामाजिक बुराइयाँ हैं, इनके खिलाफ खुलकर लड़ना होगा। हमारे मुस्लिम बुद्धिजीवियों को भी और ज्यादा आगे आकर इन जैसे धर्मान्ध लोगों की मजम्मत करनी चाहिए तभी बात बनेगी। 

हमारे साथ असल समस्या यह है कि जब दूसरे सम्प्रदाय का मामला होता है तब तो हम कट्टर आलोचक की भूमिका में आ जाते हैं पर जैसे ही मामला अपने सम्प्रदाय का हुआ, हम लोग  व्यक्ति-विशेष या समूह-विशेष की विवशताओं का ज़िक्र करके  उसको मासूम साबित करने लग जाते हैं।

इसके अलावा हमारे कुछ मीडिया चैनल्स भी चीजों से ध्यान भटकाने के लिए हिन्दू-मुस्लिम का अखण्ड जाप करते रहते हैं। सोशल मीडिया के तो कहने ही क्या उसका तो इस मुद्दे पर कॉपीराइट जैसा है।

निश्चित रूप से इंदौर में संक्रमितों का जाँच टीम पर हमला तथा हैदराबाद व गाजियाबाद में मरीजों का डॉक्टरों पर हमला किया जाना दुर्भाग्यपूर्ण है। ऐसे लोगों पर सख्त कार्यवाही होनी चाहिए और ऐसी कार्यवाही हो जो ताउम्र याद रहे। मीडिया ने विद्रूपताओं को दिखाया अच्छा किया; जरूरी भी था, पर उसको और भी बहुत कुछ दिखाना चाहिए था, जो उसने नहीं दिखाया।

पंचकूला में एक जाति-विशेष का सम्मेलन हुआ जिसमें हरियाणा विधानसभा अध्यक्ष सहित लगभग एक हजार से अधिक लोग शामिल थे। ऐसा ही कुछ तेलंगाना में  रामनवमी के अवसर पर भी हुआ। वहाँ मंत्रियों के साथ भारी संख्या में लोग जमा थे। इसके अलावा महाराष्ट्र के सोलापुर में अक्कलकोट में भगवान के वाग्दरी रथयात्रा को लेकर पुलिस और ग्रामीणों के मध्य बवाल हुआ। अपराधी को सिर्फ़ अपराधी ही माना जाना चाहिए। अपराधियों का क्या वर्गीकरण करना !!

इसके अलावा समाज में जो अच्छा हो रहा है, उसको भी इन चैनलों को दिखाना चाहिए, जैसे बुलन्दशहर में कोरोना संक्रमित रविशंकर की मृत्यु होने पर मुसलमान भाइयों ने बाकायदा हिंदू रीति-रिवाजों से अंतिम संस्कार किया। पर यह सब ज्यादा नहीं दिखाया गया क्योंकि मीडिया को तो हिंदू-मुस्लिम नरेटिव सेट करना था।हिंदू-मुस्लिम नरेटिव सेट करने से समस्याएँ हल नहीं होंगी उल्टे भारत की सांस्कृतिक विविधता को चोट पहुंचेगी।

इसके अलावा हम सबको समझना चाहिए कि मनुष्यता की रक्षा करना हम सबका धर्म है। सबसे बड़ा धर्म है मानव धर्म। सर्वेश्वर दयाल सक्सेना की ये पंक्तियां बहुत कुछ कहती हैं–


“”इस दुनिया में आदमी की जान से बड़ाकुछ भी नहीं हैन ईश्वरन ज्ञानन चुनावकागज पर लिखी कोई भी इबारतफाड़ी जा सकती हैऔर जमीन की सात परतों के भीतरगाड़ी जा सकती है।””

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