“सत्ता है अब नगर वधू”

संजीव कुमार शुक्ला सत्ता है अब नगर वधू ,  हर  कोई  उसको छूना चाहे ,, मर्यादा  की ...

“इस हरे-भरे देश में चारे की कमी नहीं है, -घोटाले

संजीव कुमार शुक्ला जो अखबारों में छपते रहते हैं, उनके यहाँ छापा पड़े, यह ठीक नहीं।...

हनुमान जी की जाति.

संजीव कुमार शुक्ला अब हनुमानजी भी अनुसूचित जाति में दर्ज़ हुए ....

नमन उन घोटालेबाजों को..

संजीव कुमार शुक्ला जिस तरह ईश्वर होता तो है, पर दिखाई नही देता, ठीक उसी तरह...

एक परंपरा का फ़िर से उद्भव

संजीव कुमार शुक्ला हमारी परंपरा में शाप देने की एक उत्कृष्ट व महती परंपरा रही है। "देहउँ श्राप कि मरिहउँ...

“दंगों के लिए अभिशप्त हम”

संजीव कुमार शुक्ला इन दंगो ने देश की शक़्ल बिगाड़ के रख दी है। ये वो ज़ख्म हैं जिनको...

चुनावी कुकरहाव-Chunavi kukrhaw

यही हाल पार्टियों के नेताओं और समर्थकों का है। यहां कुत्ता न होकर के भी कुत्तेपना को जीने की भरसक कोशिश की...

मुक्तिबोध-Muktibodh

यहां बिंब और प्रतीक कथ्य को आश्चर्यजनक तरीके से विचारोत्तेजक बनाते हैं और यही मुक्तिबोध के लेखकीय कौशल की सार्थकता है।...

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