सुकरात का धैर्य -Socrates Patience

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सुकरात के घर पर सुबह से शाम तक सत्संग के लिए आने वालों का तांता लगा रहता था।

सुकरात की पत्नी थोड़ी कर्कश स्वभाव की थी। उनको लगता था कि निठल्ले लोग बेकारी घर पर सुबह से शाम तक अड्डा जमाए बैठे रहते हैं।

वह कभी-कभी घर आने वाले लोगों के साथ रूखा व्यवहार करती। इससे सुकरात को दुख तो बहुत होता।

शुरुआत में इस बारे में उन्होंने पत्नी को समझाया था। लेकिन उनके न मानने पर उन्होंने समझाना छोड़ दिया था।

एंक दिन सुकरात कुछ लोगों के साथ बैठकर बातचीत कर रहे थे की पत्नी ने उनके ऊपर छत से गंदा पानी फेंक दिया।

इतना ही नहीं, वह बाहर से आए लोगों को नैथला कहकर गालियां भी देने लगी। लोगों को उनका यह व्यवहार बुरा लगा। सुकरात भी इससे क्षुब्ध हुए।

किंतु वह अपनी पत्नी का स्वभाव भली भांति जानते थे, इसलिए उन्होंने धैर्य का परिचय देते हुए, उपस्थित लोगों से कहा, ‘आप सभी ने यह कहावत सुनी होगी कि जो गरजता है, वह बरसते नहीं।

आज तो मेरी पत्नी ने गरजने-बरसने को एक साथ चरितार्थ कर उस कहावत को ही झुठला दिया है।’

सुकरात के यह विनोद भरे शब्द सुनते ही वहां मौजूद सभी लोगों का क्रोध शांत हो गया। उनका सत्संग फिर से शुरू हो गया।

सुकरात का धैर्य देखकर उनकी पत्नी चकित रह गईं। उसी दिन से वह घर आने वालों का स्वागत करने लगीं।

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