**सूरज भगवान वाली करनीति**-Suraj Bhagwan wali Karneeti

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संजीव शुक्ल

एक अच्छे शासक की निशानी यही है कि वह रक्षा नीति और कर नीति को बहुत बढ़िया तरीके से संचालित करे। ‘रक्षा-नीति’ कैसी हो इसके बारे में तो सभी सुस्पष्ट और एकमत हैं, कि हमें देशविरोधी तत्वों से अपने देश की रक्षा करना है।

हमें उन देशों की शातिराना हरकतों का मुंहतोड़ जवाब देना है जो हमारे देश में अस्थिरता उत्पन्न कर अपने हितों को पूरा करना चाहते हैं। अब रही बात ‘कर-नीति’ की, कि वह कैसी हो; कितनी मात्रा हो, किनसे वसूला जाय आदि-आदि।

यह बड़ा महत्त्वपूर्ण विषय है। पर इसके लिए हमें बहुत ज़्यादा चिंतित होने की आवश्यकता नहीं है। चिंतित हों हमारे दुश्मन देश जिनके पास भगवान की दया से मर्ज़ तो है पर उसका इलाज नहीं। हमारे यहाँ तो एक से बढ़कर एक विचारक हैं जिनके पास हर समस्या का समाधान है।

बल्कि यह कहें कि इन विचारकों के पास ऐसे-ऐसे विचार रूपी मन्त्र हैं कि कोई समस्या पास नहीं फटक सकती। ‘कर-नीति’ पर हमारे तुलसी बाबा ने बहुत ही बढ़िया राय दी। आप बहुत ही सुलझे हुए आदमी थे, सो सुलझी हुई राय दी। उन्होंने कहा कि —-


“बरसत हरषत लोग सब, करषत लखै न कोय।तुलसी प्रजा सुभाग ते, भूप भानु सो होय।।”


 तुलसी बाबा ने इस दोहे में अच्छे शासक की करनीति को बहुत अच्छे से व्याख्यायित किया है। उनका कहना है कि राजा को सूर्य जैसा कल्याणकारी होना चाहिए। सूर्य जब पानी को वाष्प के रूप में खींचता है तो कोई जान नहीं पाता लेकिन जब वही पानी वाष्पित होकर बादल के रूप में बरसता है तो सब लोग आनन्दित हो जाते हैं।

कहने का मतलब कर की मात्रा इतनी सूक्ष्म हो कि जनता को पता ही न चले कि वह कर भी दे रही है; अर्थात कर उसे अतिरिक्त भार-रूप में न लगे। पर जब इसी कर से प्राप्त लाभों को देने की बारी आये तो सभी लोग वाह-वाह करने लगें।

यही वह श्रेष्ठ करनीति है, जो सदियों से हमारा मार्गदर्शन करती आ रही है और आज भी कुशल राजनीतिक नेतृत्व द्वारा प्रयोग में लायी जाती है……. पर पता नहीं क्यों, लोगों को भरोसा नहीं होता ??? 

सब शंकालु से हो गए हैं ….. उनको लगता है कि सरकार हमको लूटे ले रही है …..  बग़ैर जानकारी के ऐसे थोथे आरोप लगाना कि अब करनीति में ‘सूरज भगवान वाली रणनीति’ नहीं अपनायी जाती है, हद दर्ज़े की ज़ाहिलपना की निशानी है ….

चुनावी वायदों की कसम, आप यकीन मानिये कि कर लगाने के वो तरीके आज के दौर में भी वैसे के वैसे ही हैं, जैसेकि पहले थे, बल्कि उससे भी बढ़कर हैं; बस फ़र्क है तो नजरिये का। आजकल के बजटों में भी आदमी को पता नहीं चलता कि उसकी जेब कब की कट चुकी है।

वह बग़ैर जेब के ही घूमा करता है। कई बार तो वह खरीदने की गरज़ से बड़े-बड़े शोरूम में भी घुस जाता है और बाद में “बड़े बेआबरू होकर तेरे कूचे से हम निकले” वाली स्टाइल में निकल कर आता है।

और कई बार तो खुद आता भी नहीं बाक़ायदा कुच-कुचाकर दूसरों के सहारे आता है। कहने का मतलब जनता की जेब कट जाती है और उसे भनक तक नहीं लगती या लगने नहीं दी जाती. आखिर तुलसीदास जी के उपरोक्त दोहे की कहन का सार भी तो यही है कि कुछ पता न चले। यही अच्छी करनीति की विशेषता है!!

और हमें गर्व है कि इस मामले में हमारे शासकों ने अंग्रेजों जैसी होशियार कौम को मीलों पीछे छोड़ दिया। जो काम उन्होंने ताकत के दम पर किया, वह काम हमने बहलाकर किया, कभी जाति के नाम पर, कभी धर्म के नाम पर तो कभी राष्ट्र के नाम पर।

इसके अलावा पद और गोपनीयता की यह मांग भी है, जिसकी कि शासकों ने विधायिका में घुसते ही कसम खाई थी कि हम किसी को कुछ पता नहीं लगने देंगे।

यह उसकी संवैधानिक मजबूरी भी है, जिसकी वह मजबूती से रक्षा करता है; और अगर किसी लापरवाही के कारण किसी को पता चल भी गया तो भारतीय नेतृत्व अपनी कुशल राजनीतिक चालों से उसकी शंकाओं को तत्काल निर्मूल कर देता है।

पता चलने पर कुशल शासकों द्वारा इतने बड़े-बड़े खतरे ईज़ाद कर लिए जाते हैं कि उसे उन ख़तरों की तुलना में अब अपनी जेब कटने का नुकसान बहुत छोटा लगने लगता है और वह ख़ुशी-ख़ुशी सरकार की जय हो के नारे लगाने लगता है। 

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