जाकी रही भावना जैसी-Jaki rahi bhawani jaisi

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एक संत सत्संग कर रहे थे। अचानक एक राहगीर चलते-चलते ठहर गया।

उसने संत को प्रणाम कर थोड़ी देर सत्संग किया, फिर जाने से पहले संत से कहा ‘महाराज मैं फिर आपका सत्संग सुनने आऊंगा।

लेकिन जाते-जाते मैं आपसे एक सवाल पूछना चाहता हूं।’

संत ने पलटकर उससे पूछा ‘पहले आप बताएं कि आपके गांव के लोग किस तरह के हैं?’

राहगीर ने कहा, ‘वे तो, बहुत अच्छे हैं।’

संत ने जवाब दिया, ‘मेरे गांव के लोग भी बहुत अच्छे हैं। तभी तो में इतना ज्ञान अर्जित कर पाया।’

संत के जवाब से संतुष्ट हो राहगीर वहां से चला गया।

शाम को एक और राहगीर ने संत से वहीं सवाल पूछा कि, ‘महाराज, आपके गांव के लोग कैसे हैं?’

संत ने पूछा, ‘आपके गांव के लोग कैसे हैं?’

राहगीर ने कहा, ‘मत पूछें, वे तो बहुत बुरे हैं।’

संत ने कहा, ‘मेरे गांव के लोग भी बुरे हैं। इसी कारण तो मैं यहां आकर सत्संग कर रहा हूं।’

राहगीर यह सुन चला गया। वहां उपस्थित भक्तों में से एक ने संत से पूछा, ‘महाराज, आपने दो लोगों को दो तरह के जवाब क्यों दिए?’

संत ने उसे समझाते हुए कहा, ‘देखो, अपना दृष्टिकोण ही अन्यत्र दिखता है।

सज्जन को दूसरे लोग भी सज्जन दिखते हैं, जबकि दुर्जन के लिए पूरी दुनिया ही दुष्टों से भरी है।’

भक्त की समस्या का समाधान हो गया।

जाकी रही भावना जैसी

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