नफरत

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नफरत है मुझे इस भीड़ से ,एक बार तन्हाइयों से घबराहट होती थी,

 उसके बाद सोचा सभी, मेरे साथ होंगे पर गलत थी मैं,

इस पर इतना गलत अंदाजा मुझे ना था, एक शख्स तो ऐसा मिला होता,

 जो समझता मुझे जो कहता, कुछ अपनी जो सुनाता कुछ मेरी,

मगर यह हुआ नहीं, और होगा भी नहीं,

एक भी आज बची नहीं, मुझे तन्हाई के पास,

फिर लौट आना पड़ा है और हां मैं खुशी खुश हूं, इन तन्हाइयों के बीच,

कम से कम, इन के बीच मुझे अपने अस्तित्व का खतरा तो नहीं,

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लेखक- श्रिंय़ॉगी मिश्रा

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