सेवा का पुण्य-Virtue of service

Date:

कोलकाता में भयंकर प्लेग फैला हुआ था। रोगियों की सेवा-सुरक्षा करने वाले भी भयभीत हो गए, क्योंकि वे बीमार पड़ने लगे।

किंतु स्वामी विवेकानंद इसके तनिक भी विचलित नहीं हुए, क्योंकि उन्होंने मानव सेवा का व्रत लिया था।

अपने शिष्यों के साथ वह न केवल रोगियों की सेवा करते, बल्कि सड़कों और नालियों की भी सफाई करते।

विवेकानंद का यह काम कुछ धर्म भीरु पंडितों को अच्छा नहीं लगा।

उन्हें आश्चर्य हो रहा था कि इतना बड़ा सन्यासी, जिनके अनुयायियों की संख्या भी कोई कम ना थी अपने हाथों से नालियां साफ कर रहे थे।

उन पंडितों ने स्वामी जी के पास जाकर कहा, आप यह ठीक नहीं कर रहे हैं।

इसमें कोई शक नहीं कि प्लेग से बहुत लोग मारे गए हैं और अब भी मारे जा रहे हैं।

लेकिन आप यह भली-भांति जानते हैं कि प्रत्येक मनुष्य को अपने पापों का फल भोगना पड़ता है। जिन्होंने पाप किया है वे प्लेग से पीड़ित हो रहे हैं।

ईश्वर उन्हें उनके पापों का दंड दे रहे हैं। तब आप उनकी सेवा-सुरक्षा कर भगवान के काम में व्यर्थ ही क्यों बाधक बन रहे हैं?

यह सुनकर स्वामी जी ने उत्तर दिया, बेशक बुरा काम करने वालों को दण्ड भुगतना पड़ता है।

लेकिन जो लोग कष्ट पाने वालों को कष्ट से मुक्ति दिलाने का काम कर रहे हैं,

क्या उन्हें पुण्य नहीं मिलेगा?

में ईश्वर के काम में बाधा नहीं डाल रहा, बल्कि पीड़ितों का कष्ट दूर करने की कोशिश कर पुण्य कमा रहा हूं। इन पर उन पंडितों से कुछ कहते नहीं बना।

https://www.pmwebsolution.in/

https://hindiblogs.co.in/contact-us/

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

Share post:

Subscribe

spot_imgspot_img

Popular

More like this
Related