“या ते नीचे नैन”-Ya to Niche Nain

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संजीव शुक्ल

एक बार रहीमदास जी से किसी ने पूछा कि आप दान देते समय नजरें नीची क्यों कर लेते हैं, तो जवाब में रहीमदास जी ने एक दोहा पढ़ दिया।चूँकि रहीमदास जी जाने-माने कवि थे, सो उन्होंने कविता में जवाब देने का निर्णय लिया।

दोहा यह था –” देनहार कोउ और है, भेजत सो दिन-रैन।लोग भरम हम पर धरैं, या ते नीचे नैन” कहने का मतलब यह था कि देने वाला तो कोई और है, जो रात-दिन भेजता रहता है, पर लोग भ्रमवश हमको दाता समझ रहें हैं बस इसीसे संकोचवश नयन नीचे हैं।

लोग-बाग रहीम जी की दानवीरता की जय-जयकार करते नहीं थकते थे। पर रहीमदास जी किसी भी प्रकार के अतिरिक्त सम्मान लेने के सख़्त खिलाफ़ थे। सामान्य व्यवहार में इसे विनम्रता कहते हैं। ऐसे लोग अपना सारा श्रेय दूसरे को दे डालते हैं।

बड़े लोग ऐसा ही करते हैं। रहीमदास जी भी बड़े लोगों में से थे, इसलिए दान देते समय उनका नजरें नीची  रखना, बनता था।  निश्चित रुप से यह उनकी विनम्रता ही रही होगी, पर व्यवहारिक दृष्टि से उनका ऎसा करना कतई ठीक नहीं था।

भई ऐसे में सबसे बड़ा जो ख़तरा होता है वह यह कि धूर्त आदमी आपकी नीची निगाहों का फ़ायदा उठाकर कई बार आपके सामने आकर आपसे अशर्फियाँ झीट लेगा और आप जान भी न पाऐंगे।  बताते चलें कि रहीम जी को दान देने का बहुत शौक़ था।

पैदाइशी रहा होगा ये शौक़ या यह भी हो सकता है कि शुरुआत में एक-आध बार दान देने पर उनको उसका अच्छा रिस्पॉन्स मिला होगा, लोगों ने वाहवाही की होगी, अच्छे कमेंट्स आए होंगे, तो उन्होंने इसे अपनी आदत में शुमार कर लिया होगा।

ठीक वैसे ही जैसे आजकल फेसबुक पर मिलने वाले लाइक्स व कमेंट्स से प्रेरित होकर लोग रोज़ लिखने में हाथ साफ करते हैं। हाँ, तो रहीमदास जी तो अपनी आदत से मजबूर थे। उनकी और आदतों का तो पता नहीं, पर दान देने की आदत ने उनको बहुत परेशान किया। वैसे इस आदत ने बहुतों की नाश पढ़ी है।

दानी कर्ण सब कुछ जानते हुए भी अपना जीवन रक्षक कवच-कुण्डल दान कर दिया। राजा बलि का भी यही हाल हुआ। किस-किस का नाम लिया जाय!!  रहीमदास जी भी जिनका कि बाद में अपने बॉस से बिगाड़ हो गया था जिसके कारण उनको राज्य निकाला दे दिया गया।

वह महल से सड़क पर आगये पर माँगने वालों ने तब भी उनका पीछा नहीं छोड़ा। हारकर उनको कहना ही पड़ा कि भाई अब क्या हमारी जान लोगे? उन्होंने कहा भी है “वे रहीम अब नाहिं”।  हालांकि नई पीढ़ी के लोग समझदार हैं। वे ‘दान’ के इस ख़राब इतिहास से सबक लेकर अब ख़ासा एहतियात बरतने लगे हैं।

वो बड़ा सोच-समझकर दान करते हैं ताकि उन्हें दान की आदत न लगने पाए। कुछ लोगों ने तो दान देना ही बिलकुल बंद कर दिया है। तो कुछ लोग टोटका कर के दान देने लगे हैं।

उदाहरण के तौर पर कुछ लोग दान (सरकारी अनुदान में) देने के एवज में कुछ धनराशि सुविधा-शुल्क के नाम पर ले लेते हैं ताकि  इसे पूरी तरह से ‘दान’ न कहा जा सके और इसके दुष्प्रभाव से बचा जा सके। अधिकारी, कर्मचारी व नेताओं द्वारा कुछ दिये जाने के बदले में जो नाममात्र का परसेंटेज लिया जाता है, वह और कुछ नहीं सिर्फ़ टोटका ही है।

जैसे कि कुछ भाई लोग(सब नहीं) सांसद-निधि, विधायक-निधि से वांछित राशि देते समय इसका कुछ हिस्सा “दान” के नाम के दुष्प्रभाव की काट के लिए वापस ले लेते हैं।   कुछ लोगों को लग सकता है कि ये तथाकथित माननीय लोग  बहुत घमंडी और स्वार्थी होते हैं, पर ऐसा कतई नहीं है।

ये लोग बहुत विनम्र होते हैं। साथ ही दानी होने का दंभ तो बिलकुल पालते ही नहीं। उल्टे माननीयगण तो अपनी पहचान छुपाने की भरसक कोशिश करते हैं। आप किसी भी चुनाव में देख लीजिये हमारे जनप्रिय उम्मीदवार पैसे बांटने के लिये रात का चुनाव करते हैं ताकि कोई जान न पाये।

निर्वाचन आयोग द्वारा ऐसे दानियों की खोज-खोज कर सम्मानित करने की सारी कवायद धरी की धरी रह जाती है …… कौन करेगा ऐसा गुप्त दान !!!! 

वह भी आज के जमाने में। “नेकी कर दरिया में डाल” का जितना पवित्र भाव यहां दिखता है अन्यत्र दुर्लभ है। इस मामले में ख़ैर हमें इनकी तारीफ़ करनी होगी, अन्यथा हमारे माननीय जो अर्थी तक में जाते समय मीडिया को ले जाने की हसरत रखते हों, क्या इस पुण्य कार्य मे मीडिया को नहीं ले जा सकते हैं ??????

लेकिन नहीं दान का क्या प्रचार करना !!  इस प्रजाति के अलावा एक और प्रजाति है,जो अर्थदान तो नहीं करती पर हाँ, जनता को उनके जरूरी कामों में सुविधा उपलब्ध कराकर ‘सेवा दान’ देती है। अब यह अलग बात है कि बदले में कृतकृत्य हुए लोग जबरदस्ती कुछ न कुछ उनके हाथों पर रख जाते हैं। 

आप आश्चर्य करेंगे कि “नयन नीचे करने” के संदर्भ में यह प्रजाति भी रहीमदास जी को अक्षरशः फॉलो करती है। यह प्रजाति जो लगभग हर ऑफिस में खरपतवार की तरह पाई जाती है, का कहना है कि नयन तो हमारे भी नीचे हो जाते हैं। अब हम कहें तो किससे कहें ???

उसका कहना है कि देनेवाला तो कोई और है जो दिन-रात लोगों के माध्यम से रूपया-पैसा भेजता रहता है, पर लोग हम पर शक करते हैं कि यही आदमी पैसा ले रहा है।  हम क्या करें, कहां जाएं????   

बस याते नीचे नैन |

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